Saturday, May 2, 2015

त्रासदी में कविताई

(चित्र- नेपाल त्रासदी के बाद बच्चे - गूगल से साभार)
हरे-भरे पहाड़, खूबसूरत मौसम और सजीले शहर से अचानक प्रकृति नाराज हो जाती है. धरती हिलती रही और टूटता बिखरता रहा जीवन. हर तरफ़ खौफ़नाक मंजर...खून-धूल में सने चीखते-कराहते लोग. कोई कार में बैठे कार के साथ ही दब गया. कोई माँ अपने बच्चे को नहला धुला रही होगी, कि बस एक झटका आया. माँ ने बच्चे को कलेजे से चिपटा लिया होगा कि पुराना मकान भसभसा कर गिर पड़ा होगा. कौन जानता है कितने सारे सुन्दर जीवन किस हड़बड़ी में गये कि किसी को अलविदा भी न कह सकें. एक लड़का जिसके नाखून सफ़ेद हो चुके हैं, जो छत्तीस घंटे तक अपने परिवार वालों की लाशों के बीच मलबे में जिंदा दबा रहा. लोग बेतरह उलझे, परेशान हैं. ऊपर आसमान नीचे धरती है बस उनके पास और मीडिया की कविताई देखिए...”चाँद तले सोने को मजबूर हैं लोग.”
कविता क्या है? क्या हर चीज, हर क्षण, हर पीड़ा को कविता में बाँधा जा सकता है...? कभी-कभी तो कविता भी मौन हो जाती है. ऐसे में एक त्रासदी तक को चटखारेदार लहजे में प्रस्तुत करना क्या इतना जरूरी था? दरसल सवाल कविता का नहीं, इस त्रासदी से जुड़ी और उसे महसूसने की संवेदना से है.
कोई जीवन कितना तो खुबसूरत होता है. उम्मीद और सपनों के अनगिन कोमल तंतुओं से बनता हुआ, उठता हुआ, सँवरता हुआ  जीवन ! हम जीवन का सम्मान करते हैं...किसी जिंदा शख्स के हर आचरण-व्यवहार को (गौरतलब वो चाहे जितना अजनबी हो) यथोचित सभ्य प्रतिक्रिया देते हैं, फिर मृत्यु के प्रति इतनी निष्ठुरता व उदासीनता क्यों?
आपदा के पश्चात् सोशल साइट्स (फेसबुक, वाट्सएप, ट्विटर वगैरह) पर आने वाले स्टेट्स अपडेट्स (जानकारी की शक्ल में) आफत व त्रासदी से जुड़े क्रूरतम चुटकुले तो और भी दिल जलाने वाले हैं. कोई साहब हर आधे घंटे बाद फेसबुक पर स्टेट्स अपडेट कर रहे हैं-
-    “धरती फिर कांपी! हल्का सा झटका महसूस हुआ...फीलिंग थ्रील्ड.”
तो किसी को चाँद उल्टा निकलने की आशंका है.
कुछ लोग इसके भी आगे बकायदा निश्चित वक्त व मिनट पर भूकंप के झटके आने की बकायदा घोषणा कर रहे हैं.
अन्य लोग ऐसे भी हैं जिन्हें इन भूकंप के झटकों व हादसों से भी न कोई मतलब है न दिलचस्पी. ऐसे लोग अनवरत वाट्सएप वगैरह पर हाय-हेलो कर रहे हैं, और चुटकुलों और फॉरवर्ड मेसेज्स का आदान-प्रदान कर रहे हैं. (काबिले गौर है कि ऐसे चुटकुलों में भूकंप त्रासदी पर बने चुटकुले भी शामिल हैं).
क्या हम वाकई सभ्यता के विकास के उस दौर में हैं जहाँ जिंदगी (चाहें तो जिन्दगानियाँ भी कह लें) के नष्ट होने को हम चाय/कॉफ़ी के भाप के बीच चुटकुला बनाकर हँस लें?
हमारी संवेदनाओं का समीकरण क्यों इतना गड़बड़ा गया है...कि हमें अपना, मेरा ही समझ में आता है (कभी-कभी तो वह भी नहीं). अपनों के दायरों से बाहर के प्रति सीधा-सपाट, असहिष्णु, असंवेदनशील रवैया...एक तथाकथित बिंदास मित्र के मुहावरे में...


-     “भाड़ में जाए दुनियाँ, हम बजाएँ हरमुनिया.”

No comments:

Post a Comment