बेटी माँ के सपनों का मकान होती है. माँ अपना हर
सपना हर ख्वाहिश, हर टूटन इस मकान को सजाने में लगा देती है. और माँ के सपनों से
एक नया मकान तैयार होता जाता है. माँ को जहाँ-जहाँ इस मकान में कमियाँ, टूट-फूट
दिखती है, माँ वहाँ-वहाँ रिपेयरिंग करती जाती है. माँ दरअस्ल बेटी को एक मुकम्मल-संपूर्ण
ईमारत बना देना चाहती है.
किसी माँ का सपना था कि वह शिक्षिका बन पाती,
लेकिन पति व पिता के दबाव के आगे उसने अपने सपनों का गुलाबी कागज़ फाड़-मरोड़कर
अनजानी कोठरी में फेंक दिया था. अब वही माँ, अपनी बेटी में उन सपनों को पूरा होते
देख रही है. बेटी को कंधे पर बैग डाले हड़बड़ी में स्कूटी स्टार्ट करते देख माँ को
लगता है कि उस तुड़मुड़ चुके गुलाबी पन्ने की रूमानियत और गाढ़ी हो गई है...कि कुछ
छूट जाने का सारा मलाल ही धुल गया है.
मिसेज तिवारी नब्बे वाले दशक की पीढ़ी से हैं. उस
वक्त उनके कमर से नीचे घने काले बाल थे. वे तरह-तरह के कट्स में छोटे बाल रखने की
इच्छुक थीं...पर परिवार की पाबंदियाँ आड़े आ गईं. शादी के बाद उनकी यही ख्वाहिश रही
कि उन्हें बेटियाँ हों ताकि वे अपने सारे अधूरे शौक उनसे ही पूरे कर सकें. अर्थात
बेटियाँ, माँ को अपने रूप में उन्हीं का वक्त उन्हें वापस देती हैं. मिसेज तिवारी
आगे कहती हैं कि बेटी, माँ बनने के बाद अपनी माँ को ज्यादा बेहतर ढंग से समझ पाती
हैं.
घर हमेशा माँ-बेटी के इस समीकरण का रूप ख़ुशी,
उम्मीद व दुलार से पगा नहीं होता. कई दफे इन उम्मीदों व सपनों का बोझ इतना ज्यादा
हो जाता है कि इनके भार तले यह मासूम-नाजुक रिश्ता कड़वाहटों की पाटों में पिस जाता
है.
प्रसिद्द पाकिस्तानी लेखिका व चित्रकार तहमीना
दुर्रानी सिर्फ़ अपनी दबी रंगत के कारण आजीवन माँ के प्यार को तरसती रहीं. अपनी
आत्मकथा ‘मेरे आका’ में वह लिखती हैं-
“माँ के रुख से यह साफ़ लगता था कि वह मुझे
बदसूरत समझती थीं और दोस्तों व रिश्तेदारों के सामने मुझे पेश करते हुए उसे शर्म
आती थी. मुझे नहीं याद आता कि बचपन में माँ ने कभी मुझे गले से लगाया या चूमा था.”
विश्वप्रसिद्ध एने फ्रैंक, अपनी “एक किशोरी की
डायरी’ में लिखती हैं-
“मैं
अपनी सहेलियों को अपनी माँ से बेहतर तरीके से समझती हूँ. क्या यह शर्म की बात नहीं
है? मैं माँ को एकदम बर्दाश्त नहीं कर सकती, और मुझे इसके लिए बड़ी कोशिश करनी पड़ती
है कि हर वक्त उनके साथ झड़प में न पडूँ. जिस तरह के अल्फ़ाज, जिस तरह के चिढ़ाने
वाली नजर और जिस तरह के आरोप वे दिनों-दिन मुझ पर लगाती रहती हैं, किसी तेज चढ़ी
प्रत्यंचा से छूटे बाण की तरह वे मुझे चुभते हैं जिसे मेरे शरीर से निकाल पाना
लगभग असंभव है.
नीना श्रीवास्तव एक गृहणी हैं. आज वे स्वयं एक
दो वर्षीय बच्चे की माँ हैं. बावजूद इसके वो अपनी किशोरावस्था की समस्याओं व
उलझनों के प्रति अपनी माँ के लापरवाह व उदासीन रवैये को माफ़ नहीं कर पाई हैं. पूनम
मिश्रा का अनुभव कुछ अलग रहा है. वे कहती हैं- “हमें अपनी माँ बेहद रूखी व असंवेदनशील
लगती थी. उसने कभी हम पर अन्य माओं की तरह दुलार नहीं जताया कभी हम सबसे बहुत
ज्यादा घुली मिलीं. पर एक प्रकरण में जब मेरी बड़ी बहन के कुसूरवार ठहराकर सारा घर
ही उसके खिलाफ़ हो गया तब माँ ने सबके सामने साफ़-साफ़ कहा था,
-“वो मेरी बेटी है और मैं
जानती हूँ वो ऐसा कभी नहीं कर सकती. इसलिए कौन क्या सोचता है, क्या कहता है...मुझे
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.” उस दिन हम जान पाये कि एक सख्त दिखती, औरत के भीतर
कितनी मजबूत और विश्वास से लाबालब माँ छिपी थी.
दरसल हर बेटी अपनी माँ का
ही प्रतिरूप होती है. साथ ही विरोधभास यह है कि वही बेटियाँ अपनी माँ के प्रति
असहमतियों का पुलिंदा भी होती हैं. यानि कि माँ की ही चीजें, बातें, व्यव्हार, तरीके.
सब जाने-अनजाने आत्मसात करती चली जाती हैं और माँ की मुखालफत करते-करते उनका खुद
का व्यक्तिव बहुत हद तक ‘माँ’ का ही प्रतिबिम्ब बनता जाता है.
माँ ही वह स्त्री है जो एक
लड़की के जीवन में सबसे पहले व सर्वाधिक उपस्थित होती है. माँ-बेटी के बीच यदि
पेचीदगियाँ पनपती हैं तो सिर्फ़ पीढ़ियों के अंतर की वजह से नहीं...कभी यह बहुत
ज्यादा सामान गुण-धर्म-स्वाभाव के कारण होता है, तो कभी एकदम विलोम होने के कारण.
यह रिश्ता संवेदना, आशा,
मोह, ममता व विश्वास के नाजुक महीन तंतुओं से बना होता है. इनमें से किसी भी रेशे के,
जरा भी अनावश्यक खिंचाव से रिश्ता तल्ख़ हो जाता है.
दरहकीकत माँ एक स्टोरकीपर
है. बेटीपने से जुड़ी तमाम आलोचनाएं, प्रशंसाएं, छोटी-छोटी उपलब्धियाँ, बड़ी-बड़ी
विफलताएँ, थोड़ी सी मुस्कुराहटें, मोटे-मोटे आँसू...सब स्टोर कीपर के पास गार दिए
जाते हैं. बेटी भूल जाती है. माँ सबकुछ सहेज लेती है, हमेशा के लिए...!
निदा फ़ाजली साहब ने खूब
फ़रमाया है...
बाँट के अपना चेहरा माथा
आँखें जाने कहाँ गईं.
फटे पुराने इक अलबम में ,
चंचल लड़की जैसी माँ.
चंचल लड़की जैसी माँ.
(सभी चित्र गूगल से साभार)



