Thursday, May 7, 2015

माँ-बेटी...रिश्ते का अनूठा समीकरण




बेटी माँ के सपनों का मकान होती है. माँ अपना हर सपना हर ख्वाहिश, हर टूटन इस मकान को सजाने में लगा देती है. और माँ के सपनों से एक नया मकान तैयार होता जाता है. माँ को जहाँ-जहाँ इस मकान में कमियाँ, टूट-फूट दिखती है, माँ वहाँ-वहाँ रिपेयरिंग करती जाती है. माँ दरअस्ल बेटी को एक मुकम्मल-संपूर्ण ईमारत बना देना चाहती है.
किसी माँ का सपना था कि वह शिक्षिका बन पाती, लेकिन पति व पिता के दबाव के आगे उसने अपने सपनों का गुलाबी कागज़ फाड़-मरोड़कर अनजानी कोठरी में फेंक दिया था. अब वही माँ, अपनी बेटी में उन सपनों को पूरा होते देख रही है. बेटी को कंधे पर बैग डाले हड़बड़ी में स्कूटी स्टार्ट करते देख माँ को लगता है कि उस तुड़मुड़ चुके गुलाबी पन्ने की रूमानियत और गाढ़ी हो गई है...कि कुछ छूट जाने का सारा मलाल ही धुल गया है.
मिसेज तिवारी नब्बे वाले दशक की पीढ़ी से हैं. उस वक्त उनके कमर से नीचे घने काले बाल थे. वे तरह-तरह के कट्स में छोटे बाल रखने की इच्छुक थीं...पर परिवार की पाबंदियाँ आड़े आ गईं. शादी के बाद उनकी यही ख्वाहिश रही कि उन्हें बेटियाँ हों ताकि वे अपने सारे अधूरे शौक उनसे ही पूरे कर सकें. अर्थात बेटियाँ, माँ को अपने रूप में उन्हीं का वक्त उन्हें वापस देती हैं. मिसेज तिवारी आगे कहती हैं कि बेटी, माँ बनने के बाद अपनी माँ को ज्यादा बेहतर ढंग से समझ पाती हैं.
घर हमेशा माँ-बेटी के इस समीकरण का रूप ख़ुशी, उम्मीद व दुलार से पगा नहीं होता. कई दफे इन उम्मीदों व सपनों का बोझ इतना ज्यादा हो जाता है कि इनके भार तले यह मासूम-नाजुक रिश्ता कड़वाहटों की पाटों में पिस जाता है.
प्रसिद्द पाकिस्तानी लेखिका व चित्रकार तहमीना दुर्रानी सिर्फ़ अपनी दबी रंगत के कारण आजीवन माँ के प्यार को तरसती रहीं. अपनी आत्मकथा ‘मेरे आका’ में वह लिखती हैं-
“माँ के रुख से यह साफ़ लगता था कि वह मुझे बदसूरत समझती थीं और दोस्तों व रिश्तेदारों के सामने मुझे पेश करते हुए उसे शर्म आती थी. मुझे नहीं याद आता कि बचपन में माँ ने कभी मुझे गले से लगाया या चूमा था.”
विश्वप्रसिद्ध एने फ्रैंक, अपनी “एक किशोरी की डायरी’ में लिखती हैं-
 “मैं अपनी सहेलियों को अपनी माँ से बेहतर तरीके से समझती हूँ. क्या यह शर्म की बात नहीं है? मैं माँ को एकदम बर्दाश्त नहीं कर सकती, और मुझे इसके लिए बड़ी कोशिश करनी पड़ती है कि हर वक्त उनके साथ झड़प में न पडूँ. जिस तरह के अल्फ़ाज, जिस तरह के चिढ़ाने वाली नजर और जिस तरह के आरोप वे दिनों-दिन मुझ पर लगाती रहती हैं, किसी तेज चढ़ी प्रत्यंचा से छूटे बाण की तरह वे मुझे चुभते हैं जिसे मेरे शरीर से निकाल पाना लगभग असंभव है.
नीना श्रीवास्तव एक गृहणी हैं. आज वे स्वयं एक दो वर्षीय बच्चे की माँ हैं. बावजूद इसके वो अपनी किशोरावस्था की समस्याओं व उलझनों के प्रति अपनी माँ के लापरवाह व उदासीन रवैये को माफ़ नहीं कर पाई हैं. पूनम मिश्रा का अनुभव कुछ अलग रहा है. वे कहती हैं- “हमें अपनी माँ बेहद रूखी व असंवेदनशील लगती थी. उसने कभी हम पर अन्य माओं की तरह दुलार नहीं जताया कभी हम सबसे बहुत ज्यादा घुली मिलीं. पर एक प्रकरण में जब मेरी बड़ी बहन के कुसूरवार ठहराकर सारा घर ही उसके खिलाफ़ हो गया तब माँ ने सबके सामने साफ़-साफ़ कहा था,
        -“वो मेरी बेटी है और मैं जानती हूँ वो ऐसा कभी नहीं कर सकती. इसलिए कौन क्या सोचता है, क्या कहता है...मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.” उस दिन हम जान पाये कि एक सख्त दिखती, औरत के भीतर कितनी मजबूत और विश्वास से लाबालब माँ छिपी थी.
  
   दरसल हर बेटी अपनी माँ का ही प्रतिरूप होती है. साथ ही विरोधभास यह है कि वही बेटियाँ अपनी माँ के प्रति असहमतियों का पुलिंदा भी होती हैं. यानि कि माँ की ही चीजें, बातें, व्यव्हार, तरीके. सब जाने-अनजाने आत्मसात करती चली जाती हैं और माँ की मुखालफत करते-करते उनका खुद का व्यक्तिव बहुत हद तक ‘माँ’ का ही प्रतिबिम्ब बनता जाता है.
   माँ ही वह स्त्री है जो एक लड़की के जीवन में सबसे पहले व सर्वाधिक उपस्थित होती है. माँ-बेटी के बीच यदि पेचीदगियाँ पनपती हैं तो सिर्फ़ पीढ़ियों के अंतर की वजह से नहीं...कभी यह बहुत ज्यादा सामान गुण-धर्म-स्वाभाव के कारण होता है, तो कभी एकदम विलोम होने के कारण.
   यह रिश्ता संवेदना, आशा, मोह, ममता व विश्वास के नाजुक महीन तंतुओं से बना होता है. इनमें से किसी भी रेशे के, जरा भी अनावश्यक खिंचाव से रिश्ता तल्ख़ हो जाता है.
   दरहकीकत माँ एक स्टोरकीपर है. बेटीपने से जुड़ी तमाम आलोचनाएं, प्रशंसाएं, छोटी-छोटी उपलब्धियाँ, बड़ी-बड़ी विफलताएँ, थोड़ी सी मुस्कुराहटें, मोटे-मोटे आँसू...सब स्टोर कीपर के पास गार दिए जाते हैं. बेटी भूल जाती है. माँ सबकुछ सहेज लेती है, हमेशा के लिए...!

निदा फ़ाजली साहब ने खूब फ़रमाया है...
बाँट के अपना चेहरा माथा
आँखें जाने कहाँ गईं.
फटे पुराने इक अलबम में ,
चंचल लड़की जैसी माँ.

                                                                                                             (सभी चित्र गूगल से साभार)

Saturday, May 2, 2015

त्रासदी में कविताई

(चित्र- नेपाल त्रासदी के बाद बच्चे - गूगल से साभार)
हरे-भरे पहाड़, खूबसूरत मौसम और सजीले शहर से अचानक प्रकृति नाराज हो जाती है. धरती हिलती रही और टूटता बिखरता रहा जीवन. हर तरफ़ खौफ़नाक मंजर...खून-धूल में सने चीखते-कराहते लोग. कोई कार में बैठे कार के साथ ही दब गया. कोई माँ अपने बच्चे को नहला धुला रही होगी, कि बस एक झटका आया. माँ ने बच्चे को कलेजे से चिपटा लिया होगा कि पुराना मकान भसभसा कर गिर पड़ा होगा. कौन जानता है कितने सारे सुन्दर जीवन किस हड़बड़ी में गये कि किसी को अलविदा भी न कह सकें. एक लड़का जिसके नाखून सफ़ेद हो चुके हैं, जो छत्तीस घंटे तक अपने परिवार वालों की लाशों के बीच मलबे में जिंदा दबा रहा. लोग बेतरह उलझे, परेशान हैं. ऊपर आसमान नीचे धरती है बस उनके पास और मीडिया की कविताई देखिए...”चाँद तले सोने को मजबूर हैं लोग.”
कविता क्या है? क्या हर चीज, हर क्षण, हर पीड़ा को कविता में बाँधा जा सकता है...? कभी-कभी तो कविता भी मौन हो जाती है. ऐसे में एक त्रासदी तक को चटखारेदार लहजे में प्रस्तुत करना क्या इतना जरूरी था? दरसल सवाल कविता का नहीं, इस त्रासदी से जुड़ी और उसे महसूसने की संवेदना से है.
कोई जीवन कितना तो खुबसूरत होता है. उम्मीद और सपनों के अनगिन कोमल तंतुओं से बनता हुआ, उठता हुआ, सँवरता हुआ  जीवन ! हम जीवन का सम्मान करते हैं...किसी जिंदा शख्स के हर आचरण-व्यवहार को (गौरतलब वो चाहे जितना अजनबी हो) यथोचित सभ्य प्रतिक्रिया देते हैं, फिर मृत्यु के प्रति इतनी निष्ठुरता व उदासीनता क्यों?
आपदा के पश्चात् सोशल साइट्स (फेसबुक, वाट्सएप, ट्विटर वगैरह) पर आने वाले स्टेट्स अपडेट्स (जानकारी की शक्ल में) आफत व त्रासदी से जुड़े क्रूरतम चुटकुले तो और भी दिल जलाने वाले हैं. कोई साहब हर आधे घंटे बाद फेसबुक पर स्टेट्स अपडेट कर रहे हैं-
-    “धरती फिर कांपी! हल्का सा झटका महसूस हुआ...फीलिंग थ्रील्ड.”
तो किसी को चाँद उल्टा निकलने की आशंका है.
कुछ लोग इसके भी आगे बकायदा निश्चित वक्त व मिनट पर भूकंप के झटके आने की बकायदा घोषणा कर रहे हैं.
अन्य लोग ऐसे भी हैं जिन्हें इन भूकंप के झटकों व हादसों से भी न कोई मतलब है न दिलचस्पी. ऐसे लोग अनवरत वाट्सएप वगैरह पर हाय-हेलो कर रहे हैं, और चुटकुलों और फॉरवर्ड मेसेज्स का आदान-प्रदान कर रहे हैं. (काबिले गौर है कि ऐसे चुटकुलों में भूकंप त्रासदी पर बने चुटकुले भी शामिल हैं).
क्या हम वाकई सभ्यता के विकास के उस दौर में हैं जहाँ जिंदगी (चाहें तो जिन्दगानियाँ भी कह लें) के नष्ट होने को हम चाय/कॉफ़ी के भाप के बीच चुटकुला बनाकर हँस लें?
हमारी संवेदनाओं का समीकरण क्यों इतना गड़बड़ा गया है...कि हमें अपना, मेरा ही समझ में आता है (कभी-कभी तो वह भी नहीं). अपनों के दायरों से बाहर के प्रति सीधा-सपाट, असहिष्णु, असंवेदनशील रवैया...एक तथाकथित बिंदास मित्र के मुहावरे में...


-     “भाड़ में जाए दुनियाँ, हम बजाएँ हरमुनिया.”

Sunday, February 22, 2015

मेरी गुड़िया तेरा गुड्डा

मेरी गुड़िया तेरा गुड्डा
चल करते हैं शादी
तुम बनना गुड्डे के अब्बा
मैं गुड़िया की दादी।

फटा दुपट्टा दीदी का
अम्मा की पीली साड़ी
लहंगा,गोटे,चुनरी से
सँवरी यह राजदुलारी ।

शादी तो कर देंगे हम
पर क्या खिलाएं खाना,
कहॅा से लाएँ मेज व कुर्सी
कहॅा सजे शमियाना।

अक्ल सुझाई चंपक ने
छोड़ो यह ताना बाना।
मैं लाता हुँ बिस्कुट घर से
टॅाफी तुम ले आना।

-उपासना-
 (चित्र- गूगल से साभार)